हादसों ने फासले बना रखे हैं 

दरमिया हमारे यूँ तो कुछ नहीं। 

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बाजी इश्क की लगीं थीं और हारा मैं दिल था 

बहुत शराफत से फिर बेवफा ने लुटा मुझको।

कैसे करता मैं आरजू एक मुकम्मल ख्वाब की
उम्र भर निंद के लिए मरता  रहा हूँ मैं।

टूट कर बिखरी थी जो आरजूएँ पल भर में
कच्ची निंद की ताबिरो को सिता रहा हूँ मैं। 

मुख्तसर सी जिंदगी में सब देखा  मैंने
द-रों कि विरानी में बिखरता  रहा हूँ मैं।

डूबती नबजो में अब मेरा दरद सो गया
शिकार-ए-मुफलिसी तरसता रहा हूँ मैं।

पयास की ये शिद्दत  कोइ देखे न आखों में
सजदे में सर झुकाए सुनता रहा हूं मैं।

बैचेनियां दफन हैं सिसकते जेहन में
सुकुते दरद मे तुम बिन तडपता रहा हू मैं।

कैसे करता मैं आरजू एक ख्वाब की
उम्र भर निंद की दुआ में जिता रहा हूँ मैं।

टूट कर बिखरा था जो पल भर में
कच्ची निंद की ताबिरों को सिता रहा हूँ मैं।

मुख्तसर सी जिंदगी में सब देख लिया मैंने
दरों-दिवार कि विरानी में बसता रहा हूँ मैं।

डूबती नबजो में अब दरद सो गया
शिकार-ए-मुफलिसी तरसता रहा हूँ मैं।

पयास की शिद्दत कोई देखे न आखों में
सजदे में सर झुकाए सुनता रहा हूं मैं।

बैचेनियां दफन हैं सिसकते जेहन में
नि:शब्द सही तुम बिन तडपता रहा हूं मैं।

मेरे होने न होने की फिक्र हो तुम्हें
कुछ एसी अब मुझे जुदाई दो

एक जिने की वजह ही तो चाहता हूं
यूँ न इश्क से  बेदर्द रिहाई दो

बैठा हूँ प्यासा तेरे दर पर कब से
एक जाम निगाहों से पिला ही दो

बहुत बिखरा हूँ मैं अपने भितर
अपनी बैचेनियों में मुझे अब जगह दो

कोई हमसफर नहीं है इन राहों में
दो कदम ही सही वफा निभा भी दो

मैं तुमसे जुदा हो न सका अब तलक
अब खुद मे मेरी रुह मिला ही दो।

मैं, हर शब का गुनहगार हुँ
अपनी ही मौत का तलबगार हुँ
खुदाया, मुझे कैद-ए-जिंदगी से रिहाई दे दे।

तेरी आहट से रुह गुलजार है
मैं साँस भी लुँ, तो गजल होती है।